पर्यावरण और राजनीति:क्या 2025 के भारत में बदलाव की उम्मीद है?

“जलवायु परिवर्तन की चुनौती हमारे सामने है, लेकिन राजनीति और समाज इसे नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ रहे हैं।”

By Rohit Kumar

भारत में पर्यावरणीय समस्याएँ लगातार गहराती जा रही हैं। देश भर में प्राकृतिक आपदाओं, बढ़ते प्रदूषण, और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव स्पष्ट हैं, लेकिन क्या राजनीतिक वर्ग और समाज इन मुद्दों को गंभीरता से ले रहे हैं? दिल्ली के ऊपर हर साल छाने वाली जहरीली धुंध (स्मॉग) देश की गंभीर वायु गुणवत्ता समस्या का प्रतीक बन चुकी है। 2024 की सर्दियों में, दिल्ली की वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) “गंभीर” श्रेणी में बना रहा। फसल अवशेष जलाने, वाहन उत्सर्जन, और औद्योगिक प्रदूषण के मिश्रण ने दिल्ली को गैस चैंबर में बदल दिया है।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर पिघलने और बादल फटने की घटनाएँ अब आम हो गई हैं। मानसून के दौरान मुंबई और चेन्नई जैसे शहरों में जलभराव और अनियमित मौसम का प्रभाव जलवायु संकट की गहरी सच्चाई को उजागर करता है।गंगा और यमुना जैसी प्रमुख नदियाँ अब भी गंभीर प्रदूषण से जूझ रही हैं। बैंगलोर की वर्तुर झील जहरीली झाग से भरी हुई है, जबकि हैदराबाद की हुसैन सागर झील लगातार सिकुड़ती जा रही है। प्लास्टिक कचरे और लैंडफिल साइटों का बढ़ता बोझ शहरी क्षेत्रों में जीवन को प्रभावित कर रहा है। स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद, कचरा प्रबंधन में संरचनात्मक समस्याएँ बनी हुई हैं।

राजनीति में पर्यावरण: क्यों है यह हाशिये पर?

पर्यावरण पर सामाजिक समूहों में चर्चा का महत्व केवल जागरूकता बढ़ाने तक सीमित नहीं है; यह राजनीतिक प्राथमिकताओं को भी आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आज, जब स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे मुद्दे हमारी रोजमर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित कर रहे हैं—चाहे वह दिल्ली की जहरीली हवा हो, गंगा जैसी नदियों का प्रदूषण, या जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती प्राकृतिक आपदाएँ—आम जनता इन पर खुलकर बात नहीं करती।

इस चुप्पी का परिणाम यह है कि राजनीतिक दल इन मुद्दों को अपने चुनावी एजेंडे में प्राथमिकता नहीं देते। 2024 में भी, बड़े राजनीतिक दल जाति, धर्म, और रोजगार जैसे पारंपरिक मुद्दों को ही केंद्र में रखते हैं, क्योंकि ये वोट हासिल करने के लिए प्रभावशाली माने जाते हैं। पर्यावरण, जिसे दीर्घकालिक नीति और योजनाओं की आवश्यकता है, केवल हाशिये पर रह जाता है।

जब सामाजिक समूह इन मुद्दों को चर्चा का विषय बनाएंगे, तभी जनता और राजनेताओं के बीच संवाद स्थापित होगा। यह पर्यावरण को लेकर सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करेगा और सरकारों को हरित नीतियों को लागू करने और प्रदूषण नियंत्रण जैसे कार्यों में अधिक निवेश करने के लिए मजबूर करेगा। इसलिए, सामाजिक समूहों में पर्यावरण पर चर्चा करना हमारी वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक अनिवार्य कदम है।

पर्यावरणीय समूहों की सीमाएँ

पर्यावरण पर सामाजिक समूहों में चर्चा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जागरूकता और सामूहिक कार्रवाई को प्रोत्साहित करता है। जब लोग पर्यावरणीय मुद्दों जैसे जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, और जल संरक्षण पर बात करते हैं, तो इससे समस्याओं की गंभीरता को समझने और समाधान खोजने में मदद मिलती है। सामाजिक समूह न केवल शिक्षा का माध्यम बनते हैं, बल्कि वे व्यक्तिगत आदतों में बदलाव लाने और बड़े स्तर पर नीति-निर्माण को प्रभावित करने का प्लेटफॉर्म भी प्रदान करते हैं। ऐसे संवाद सामुदायिक सहयोग और पर्यावरणीय जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देते हैं, जिससे सतत विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। कुछ छोटे दल और समूह, जैसे उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी, पर्यावरण पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, लेकिन वे राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव डालने में विफल रहे हैं।भारतीय मीडिया अब भी पर्यावरणीय संकटों को प्राथमिकता देने में असफल है। जहाँ यूरोप और अमेरिका में जलवायु परिवर्तन पर गहन चर्चा होती है, भारत में यह केवल आपदाओं के समय ही खबर बनती है।

2024 में भारत ने जंगलों में आग और रिकॉर्डतोड़ गर्मी के कारण गंभीर पर्यावरणीय संकटों का सामना किया है। मानसून से पहले के महीनों में सामान्यत: होने वाली जंगलों की आग इस साल और अधिक विकराल हो गई है, विशेष रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम और मणिपुर जैसे राज्यों में। इन आगों ने वनस्पति, वन्यजीवों और मानव बस्तियों को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया है। उदाहरण के लिए, हिमाचल प्रदेश में अकेले 17,000 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि आग में जल गई। सूखे हालात और भूमि की सफाई जैसी बढ़ती मानव गतिविधियाँ इन आगों को और भी तीव्र और आवधिक बना रही हैं। एक अध्ययन में यह भी बताया गया है कि उच्च तापमान और कम बारिश, विशेष रूप से दक्षिण और उत्तर-पूर्वी भारत में, आग के फैलने के लिए अनुकूल वातावरण बना रहे हैं​।

2024 की गर्मी का मौसम, जिसमें दिल्ली जैसे शहरों में रिकॉर्ड तोड़ तापमान दर्ज किया गया, ने पर्यावरण पर और अधिक दबाव डाला है। दिल्ली में तापमान 52°C तक पहुँच गया, जो पिछले वर्षों में सबसे अधिक था, जिससे स्वास्थ्य समस्याएँ और जल संकट बढ़ गए हैं​। ये चरम परिस्थितियाँ जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई हैं, जिसने न केवल लम्बे और तीव्र गर्मी के लहरों को जन्म दिया है, बल्कि वर्षा में कमी भी आई है, जिससे वनस्पति अधिक सूख गई है और आग लगने की संभावना बढ़ गई है​

जंगलों की आग और अत्यधिक गर्मी का यह मिश्रण भारत की पारिस्थितिकी प्रणालियों, सार्वजनिक स्वास्थ्य और कृषि उत्पादकता के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि वन अग्नि प्रबंधन को सुधारने, बेहतर भविष्यवाणी मॉडल विकसित करने, और जन जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके अलावा, अग्नि अवरोधक, नियंत्रित जलाने और सतत भूमि उपयोग प्रथाओं में निवेश जैसे कदम इन बढ़ते जोखिमों को कम करने के लिए महत्वपूर्ण हैं​

अंत में, 2024 में जंगलों की आग और अत्यधिक गर्मी की चुनौतियाँ भारत में पर्यावरणीय प्रबंधन के लिए एक व्यापक और अनुकूलित दृष्टिकोण की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। जलवायु परिवर्तन और मानवजनित कारणों के कारण ये घटनाएँ अधिक बार और विनाशकारी हो रही हैं, और केवल सरकार, स्थानीय समुदायों और पर्यावरण संगठनों के समन्वित प्रयासों से ही इनके प्रभाव को कम किया जा सकता है​

नीदरलैंड्स का उदाहरण: क्या हम कुछ सीख सकते हैं?

डच ग्रीन पार्टी GroenLinks ने पर्यावरण को मुख्यधारा की राजनीति में लाकर सफलता हासिल की। भारत में ऐसा कोई राजनेता या दल नहीं है जो जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों को लेकर जनता को लामबंद कर सके। इसका कारण समाज में जागरूकता और दबाव की कमी है।


क्या भारत पर्यावरणीय संकट से निपटने के लिए तैयार है?

समाज में जागरूकता का अभाव

पर्यावरणीय संकटों का समाधान केवल सरकारी नीतियों तक सीमित नहीं हो सकता; यह समाज के हर वर्ग की भागीदारी की माँग करता है। इसके लिए जन जागरूकता अनिवार्य है। विश्वविद्यालय और शैक्षणिक संस्थान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, जहाँ युवाओं को पर्यावरणीय मुद्दों पर खुली चर्चा और समाधान खोजने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। युवाओं की भागीदारी सोशल मीडिया और सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से पर्यावरणीय मुद्दों को जन-आंदोलन में बदल सकती है।

सरकार को प्रदूषण नियंत्रण के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों और वाहनों पर भारी जुर्माने लगाने, नवीकरणीय ऊर्जा को सब्सिडी देने, और सार्वजनिक परिवहन को सुधारने जैसी नीतियाँ लागू करनी होंगी। यह न केवल पर्यावरण को सुरक्षित बनाएगा, बल्कि समाज को टिकाऊ विकास के रास्ते पर भी ले जाएगा।

हालांकि, यह स्पष्ट है कि जब तक जनता स्वयं पर्यावरणीय मुद्दों को प्राथमिकता नहीं देती, तब तक राजनेता भी इसे अपने एजेंडे में शामिल नहीं करेंगे। “हरित घोषणापत्र” जैसे विचारों को राजनीति के मुख्यधारा में लाने के लिए राजनीतिक दबाव बनाना आवश्यक है। जनता को यह समझना होगा कि पर्यावरणीय सुधार केवल व्यक्तिगत प्रयासों से नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों और उसके अमल से ही संभव हैं।

दिल्ली की जहरीली हवा, जल संकट, और प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद, पर्यावरण अभी भी समाज और राजनीति की प्राथमिकता सूची में निचले स्थान पर है। अगर भारत को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटना है और हरित भविष्य की ओर बढ़ना है, तो उसे अपनी सोच और नीतियों में बड़ा बदलाव लाना होगा। अब समय आ गया है कि पर्यावरण को राष्ट्रीय विमर्श और राजनीतिक एजेंडे का एक केंद्रीय मुद्दा बनाया जाए। केवल तभी, भारत वैश्विक जलवायु नेतृत्व में अपनी प्रभावी भूमिका निभा सकेगा।

रोहित कुमार, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड हैं।

1 thought on “पर्यावरण और राजनीति:क्या 2025 के भारत में बदलाव की उम्मीद है?”

  1. Very well articulated the Real problems faced by Indians.

    Each person should consider to contribute their bit like not using polythene bags, conserving water electricity, segregating our garbage before disposing and become crusader in our community. We should also talk to our local politician about these issues.

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