हाल ही में भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की एक टिप्पणी ने विवाद खड़ा कर दिया, यद्यपि संभवतः यह विवाद अनावश्यक था और केवल कुछ अति-संवेदनशील लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ। Rakesh Dalal v. Union of India & Ors. की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति गवई ने कथित रूप से कहा—
“यह तो महज़ पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन है… जाकर स्वयं देवता से कहो कुछ करें। यदि आप स्वयं को भगवान विष्णु का गहरा भक्त बताते हैं, तो प्रार्थना कीजिए और ध्यान कीजिए।”
इस कथन को प्रसंग से अलग करके प्रस्तुत किया गया और तुरंत वायरल हो गया। सोशल मीडिया पर इसे हिंदू-विरोधी कहकर आलोचना की गई, विशेषकर उन लोगों द्वारा, जो इस कथन के पीछे छिपे गहरे न्यायशास्त्रीय दर्शन को समझने में असफल रहे। वस्तुतः, न्यायमूर्ति गवई के शब्द एक लंबे समय से चले आ रहे संवैधानिक संयम की पुनः पुष्टि थे—कि न्यायपालिका को धार्मिक उपासना और मंदिर व्यवस्था के पवित्र क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

भारत के मंदिर एक ओर तो लौकिक विधियों से शासित होते हैं और दूसरी ओर दैवीय आदेशों व धार्मिक परंपराओं से। न्यायपालिका कानून के मामलों में सर्वोपरि होते हुए भी, आत्मिक शासन के क्षेत्र में अपनी सीमाओं को सदैव स्वीकारती आई है। न्यायमूर्ति गवई की यह टिप्पणी अवमाननापूर्ण नहीं थी, बल्कि इसने हिन्दू आस्था की पवित्रता को पुनः मान्यता दी कि भगवान विष्णु, परमदेवता के रूप में, न्यायिक सत्ता से भी परे हैं।
विवादित मामला भगवान विष्णु की खंडित प्रतिमा की पूजा से संबंधित था। हिंदू मान्यता में खंडित प्रतिमा की पूजा निषिद्ध मानी जाती है। याचिकाकर्ता ने अदालत से आदेश मांगा कि खंडित प्रतिमा की पूजा की अनुमति दी जाए, परंतु न्यायमूर्ति गवई ने उचित रूप से यह स्पष्ट किया कि ऐसे विषय दैवीय इच्छा और धार्मिक परंपरा के अंतर्गत आते हैं, न कि न्यायालयीन आदेश के। अतः इस मामले में स्वयं भगवान विष्णु ही याचिकाकर्ता का मार्गदर्शन कर सकते हैं।
भारतीय न्यायशास्त्र ने लंबे समय से हिंदू देवताओं को विधिक व्यक्तित्व (juristic person) के रूप में मान्यता दी है, अर्थात वे संपत्ति के स्वामी हो सकते हैं, मुकदमा दायर कर सकते हैं और उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है। Pramatha Nath Mullick v. Pradyumna Kumar Mullick (1925) में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने यह ठहराया कि हिंदू प्रतिमा, जो धार्मिक परंपरा में निहित है, एक विधिक इकाई है।
इससे पूर्व Dakor Temple Case (1887) में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा था कि एक हिंदू प्रतिमा एक पवित्र विचार का मूर्त रूप है और इस कारण वह विधिक विषय (juridical subject) है। यही सिद्धांत राम जन्मभूमि मामले में और स्पष्ट हुआ, जहाँ ‘राम लल्ला विराजमान’ स्वयं एक वादकारी पक्ष थे और उनके लिए विधिक परामर्शदाता उपस्थित थे।
सर्वोच्च न्यायालय ने Shiromani Gurdwara Parbandhak Committee v. Som Nath Dass तथा Profulla Chorone Requitte v. Satya Chorone Requitte जैसे मामलों में ईश्वर की निराकार अवधारणा और मूर्त रूप (प्रतिमा) में भेद किया। प्रतिमा, प्राणप्रतिष्ठा के पश्चात, दैवीय उपस्थिति का जीवित रूप मानी जाती है और इस प्रकार विधिक व्यक्तित्व अर्जित करती है।
Sheshammal v. State of Tamil Nadu में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक बार प्रतिमा की प्राणप्रतिष्ठा हो जाने के बाद उसमें दैवीय शक्ति का वास माना जाता है। पूजा-पद्धति, जो आगमों और मंदिर शास्त्रों से संचालित होती है, का कड़ाई से पालन अनिवार्य है और किसी भी विचलन को प्रतिमा का अपवित्रीकरण माना जाता है। ऐसे मामलों में न्यायालय परंपरागत रूप से हस्तक्षेप से बचते आए हैं।
भारत में मंदिरों को broadly दो श्रेणियों में रखा जाता है—आगमिक (जहाँ पूजा-अर्चना पूरी तरह आगम या दैवीय आदेशों पर आधारित होती है) और अनागमिक (जहाँ लौकिक व्यवस्था लागू होती है)। (Srirangam Koli v. State of Tamil Nadu)। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा है कि न्यायालयों को मंदिर के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि धार्मिक परंपराओं, दैवीय आदेशों या शास्त्रों से विचलन न हो। Srivari Daadaa v. Trimula Tripati Devastham मामले में कहा गया कि मंदिर संबंधी मुद्दों पर निर्णय पंडितों, विद्वानों या सलाहकारों को देना चाहिए, न कि न्यायालय को।
इस न्यायिक संयम का उदाहरण Odisha Vikash Parishad v. Union of India (कोविड-19 काल में) में दिखा, जब न्यायालय ने रथयात्रा की अनुमति दी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे ने कहा—“यदि रथयात्रा रोकी गई तो भगवान जगन्नाथ हमें क्षमा नहीं करेंगे।” इसी तरह श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर मामले में यह प्रश्न उठा कि भगवान विष्णु को ‘वेङ्कटेश सुप्रभातम्’ के माध्यम से जगाया जाए या नहीं। इस पर न्यायालय ने कहा—“भगवान को किस प्रकार और किस भजन से जगाना है, यह आस्था का प्रश्न है। इस पर हम निर्णय नहीं देंगे। यह मुख्य तंत्री तय करेंगे।”
भारतीय न्यायालयों ने सदैव मंदिरों के धार्मिक मामलों और परंपराओं में हस्तक्षेप न करने की दीर्घ परंपरा बनाए रखी है। सबरिमला मामले में न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा का असहमति मत इसी न्यायशास्त्रीय दृष्टिकोण को और पुष्ट करता है। अतः Rakesh Dalal मामले में न्यायमूर्ति गवई की टिप्पणी को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। खंडित प्रतिमा की पूजा की अनुमति न देने का उनका निर्णय श्रद्धा के खंडन के रूप में नहीं, बल्कि उसके पुनः अनुमोदन के रूप में समझा जाना चाहिए। उन्होंने याचिकाकर्ता को भगवान विष्णु से ही मार्गदर्शन लेने को कहा—और यही वह गहन सत्य है कि दैवीय विषयों में सर्वोच्च न्यायालय भी उस परमसत्ता के समक्ष नतमस्तक है।
लेखक :
रोहित कुमार
एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड, सर्वोच्च न्यायालय, भारत
(व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं)